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भारतीय रिजर्व बैंक ने फेडरल बैंक पर 5 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया


भारतीय रिजर्व बैंक ने नियमों की अनदेखी के लिए फेडरल बैंक पर 5 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया है। यह जानकारी भारतीय रिजर्व बैंक ने दी। 

रिजर्व बैंक ने फेडरल बैंक पर यह जुर्माना बड़े कर्ज लेने वाले के बारे में रिपोर्ट करने में चूक और ग्राहकों को मुआवजे का भुगतान नहीं करने और अन्य उल्लंघनों के लिए लगाया गया है। 


फेडरल बैंक पर जुर्माना क्यों लगा?

भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, फेडरल बैंक ने बड़े कर्ज को लेकर केंद्रीय रिपॉजिटरी पर रिपोर्टिंग संबंधी नियमों का अनुपालन नहीं किया है। यह एक बड़ी चूक है। इसके अलावा फेडरल बैंक जोखिम आधारित निगरानी आकलन के संबंध में रिजर्व बैंक को रिपोर्ट नहीं कर पाया है। साथ ही बैंक ने एटीएम संबंधित शिकायतों का निपटारा करने में होने वाली देरी के लिए दिए जाने वाला जुर्माना भी नहीं दिया है। इसके अलावा बैंक केवाईसी और मनी लांड्रिंग रोकने के लिए बनाए गए नियमों का पालन करने में असफल रहा है। 


अन्य बैंक पर भी लगाया जा चुका है जुर्माना

करूर वैश्य बैंक पर भी लगाया जा चुका है जुर्माना इससे पहले आरबीआई प्राइवेट क्षेत्र के बैंक करूर वैश्य बैंक पर भी 5 करोड़ रुपए का जुर्माना लगा चुका है। आरबीआई ने इस बैंक पर जरूरी निर्देश नहीं मानने पर यह जुर्माना लगाया है। 

इसके अलावा आरबीआई ने बीते सप्ताह ही प्राइवेट सेक्टर के बंधन बैंक पर लाइसेंसिंग शर्तों का पालन नहीं करने पर कार्रवाई की थी। केंद्रीय बैंक ने बंधन बैंक पर नई शाखाएं खोलने से रोकने के अलावा बैंक के एमडी और सीईओ के सैलरी खाते फ्रीज करने का आदेश दिया था। 

भारतीय रिजर्व बैंक ने यूनियन बैंक आफ इंडिया पर धोखाधड़ी पकड़ने और उसके बारे में रिपोर्ट करने में देरी को लेकर एक करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया था। यूनियन बैंक आफ इंडिया की ओर से जारी रिजर्व बैंक ने हमारे ऊपर धोखाधड़ी पकड़ने और उसके बारे में रिपोर्ट करने में विलंब को लेकर एक करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया। 

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सेबी ने शेयर बायबैक नियमों को संशोधित किया


भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने 17 सितम्बर 2018 को शेयरों को वापस खरीदने (बायबैक) के नियमों में संशोधन किया है। इसका उद्देश्य शेयर बायबैक के लिए सार्वजनिक रूप से कोई घोषणा करने की जरूरत पर और ज्यादा स्पष्टता लाना है।

सेबी के अनुसार क्रेडिट रेटिंग संस्थाएं पब्लिक या राइट्स इश्यू के जरिये ऑफर की गई सिक्युरिटीज की रेटिंग के अलावा और किसी भी तरह की गतिविधि में शामिल नहीं होंगी।

मुख्य तथ्य
  • सेबी के मुताबिक रेटिंग कंपनी को वित्तीय प्रतिभूतियों की रेटिंग तय करने और आर्थिक अथवा वित्तीय शोध एवं विश्लेषण कार्य अलावा दूसरे कामों को अलग कंपनी में बांटने का नियम लागू किया है। इसके लिए दो साल का समय दिया गया है।
  • नए नियमों के तहत सेबी ने भगोड़े आर्थिक अपराधियों को किसी कंपनी में शेयर खरीदने या ओपन ऑफर में बोली लगाने से प्रतिबंधित कर दिया है।
  • सेबी ने 11 सितंबर को जारी अधिसूचना में कहा कि भगोड़ा आर्थिक अपराधी किसी भी कंपनी के ओपन ऑफर के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बोली नहीं लगा सकता है। इसके साथ ही कंपनी अधिनियम 2013 के अनुरूप ‘मुक्त आरक्षित भंडार’ के बारे में स्पष्टीकरण को नये ढांचे में शामिल किया गया है।
  • सेबी ने भाषा के सरलीकरण, अस्पष्टता खत्म करने और अप्रैल 2014 में अस्तित्व में आए नए कंपनी कानून के हिसाब से नए रेफरेंस जोड़ने के लिए शेयर बायबैक के नियमों में संशोधन किया है।
  • कोई भी कंपनी जिसे शेयरों की वापस खरीद की अनुमति दी जाती है उसे दो कार्यदिवसों के भीतर इसकी सार्वजनिक घोषणा करनी होगी।

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी)

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) भारत में प्रतिभूति और वित्त का नियामक बोर्ड है। इसकी स्थापना सेबी अधिनियम 1992 के तहत 12 अप्रैल 1992 में हुई। सेबी का मुख्यालय मुंबई में हैं और क्रमश: नई दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई और अहमदाबाद में क्षेत्रीय कार्यालय हैं।

सेबी के अस्तित्व में आने से पहले पूंजी निर्गम नियंत्रक नियामक प्राधिकरण था, जिसे पूंजी मुद्दे (नियंत्रण) अधिनियम, 1947 के अंतर्गत अधिकार प्राप्त थे। सेबी का प्रमुख उद्देश्य भारतीय स्टाक निवेशकों के हितों का उत्तम संरक्षण प्रदान करना और प्रतिभूति बाजार के विकास तथा नियमन को प्रवर्तित करना है।

बायबैक क्या है

बायबैक एक निर्धारित समय में पूरी की जाने वाली एक प्रक्रिया है जिसमें निवेशकों के अतिरिक्त शेयरों को अपने सरप्लस का इस्तेमाल कर खुले बाजार से खरीदा जाता है. ये शेयर बाजार मूल्य या उससे ज्यादा कीमत पर खरीदे जाते हैं।

अधिसूचना के मुताबिक कंपनी निदेशक मंडल की बायबैक के लिये मंजूरी मिलने और इस पेशकश को स्वीकार करने वाले शेयरधारकों को भुगतान मिलने की तिथि को बायबैक अवधि के तौर पर परिभाषित किया गया है।
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रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड का बाजार पूंजीकरण 8 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचा



मुकेश अंबानी की स्वामित्व वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) का कुल मार्केट कैप (बाजार पूंजीकरण) पहली बार 8 लाख करोड़ रुपये के पार हो गया है इसके साथ ही रिलायंस इंडस्ट्रीज इस स्तर तक पहुँचने वाली देश की पहली कंपनी बन गर्इ है

1.27 प्रतिशत बढ़त के साथ रिलायंस के एक शेयर की कीमत 1,262 रुपये हो गई और कंपनी का मार्केट कैप 8,00,001.54 करोड़ रुपये तक पहुँच गया आरआईएल ने मार्केट कैप के मामले में टीसीएस को पीछे छोड़ा है टीसीएस का मार्केट कैप 7,77,870 करोड़ रुपये है

रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने लगभग ग्यारह वर्ष के अन्तराल के बाद 100 अरब डॉलर (लगभग 68 खरब रुपये) का आंकड़ा छुआ है गौरतलब है कि आरआईएल तेल से लेकर टेलिकॉम के क्षेत्र में काम करता हैरिलायंस के 41वीं वार्षिक सम्मेलन में मुकेश अंबानी ने कहा था कि कंपनी वर्ष 2025 तक दोगुना विस्तार करना चाहती है

बाजार पूंजीकरण तथा भारतीय कम्पनियां
  • बाजार पूंजीकरण के मामले में मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज के बाद दूसरे नंबर पर टाटा कंसल्टेंसजी सर्विसेज (टीसीएस) है
  • टीसीएस  का कुल मार्केट कैप 7.8 लाख करोड़ रुपये है 
  • लगभग 5.69 लाख करोड़ रुपये के बाजार पूंजीकरण के साथ एचडीएफसी बैंक तीसरे और हिंदुस्तान यूनिलीवर (एचयूएल) चौथे स्थान पर है। एचयूएल का कुल मार्केट कैप 3.82 लाख करोड़ रुपये है
  • देश के पांचवीं सबसे बड़ी कंपनी की बात करें तो 3.79 लाख करोड़ रुपये के मार्केट कैप के साथ आर्इटीसी पांचवे स्थान पर है

मार्केट कैप (बाजार पूंजीकरण) क्या है?

कंपनी के मार्केट कैपिटलाइज़ेशन का मतलब है शेयर बाजार द्वारा निर्धारित उस कंपनी का मूल्य शेयर बाजार में कंपनियों को अपने मार्केट कैप के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है, क्योंकि प्रत्येक वर्ग अपने कुछ विशेष लक्षण दर्शाता है कंपनी के एक शेयर की कीमत से कुल शेयरों की संख्या को गुणा करके इसकी गणना की जाती है
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रिलायंस समूह के अध्यक्ष मुकेश अंबानी एशिया के सबसे अमीर आदमी बने


मुकेश अंबानी ने यह मुकाम अलीबाबा ग्रुप के संस्थापक जैक मा को पछाड़ते हुए हासिल किया है।    रिलायंस समूह के अध्यक्ष मुकेश अंबानी अब एशिया के सबसे अमीर आदमी बन गए हैं। उन्होंने यह उपलब्धि चीनी कंपनी अलीबाबा के संस्थापक जैक मा को पछाड़ते हुए हासिल की है। खबरों के मुताबिकशुक्रवार को मुकेश अंबानी की संपत्ति 44.3 बिलियन डॉलर यानी 3.012 लाख करोड़ रुपये हो गई. उधर गुरुवार को बंद हुए शेयर बाजार के भाव के अनुसार जैक मा की नेटवर्थ 44 अरब डॉलर यानी 2.99 लाख करोड़ रुपये की रही। इन आंकड़ों के मद्देनजर भारतीय शेयर बाजार में रिलायंस समूह के शेयरों में जबरदस्त तेजी भी देखने को मिली।     हिंदुस्तान में टेलीकॉम से लेकर पेट्रो कैमिकल्स जैसे अनेक क्षेत्रों में काम करने वाली रिलायंस समूह के अध्यक्ष की दौलत में इस साल 27.2 हजार करोड़ रुपये का इजाफा हुआ है। उधर, साल 2018 के दौरान जैक मा की कुल दौलत में 9500 करोड़ रुपये की कमी आई है। इस बीच हाल में हुई एजीएम बैठक के दौरान मुकेश अंबानी ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के ई-कॉमर्स बाजार में भी उतरने की घोषणा की थी। इसके अलावा इसी साल स्वतंत्रता दिवस के मौके पर रिलांयस अपनी टेलीकॉम कंपनी जियो की ब्रॉडबैंड और डीटीएच सेवाएं शुरू करने की बात भी कर चुकी है।    मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाले रिलायंस समूह के नाम पर इसी साल एक खास उपलब्धि तब जुड़ी थी जब यह दुनिया की 100 अरब डॉलर कंपनियों के क्लब में शामिल हुई थी। हालांकि शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव की वजह से इसे इस क्लब से बाहर भी होना पड़ा था। लेकिन इसी गुरुवार को रिलायंस यह मुकाम दोबारा हासिल कर लिया था।


मुकेश अंबानी ने यह मुकाम अलीबाबा ग्रुप के संस्थापक जैक मा को पछाड़ते हुए हासिल किया है

रिलायंस समूह के अध्यक्ष मुकेश अंबानी अब एशिया के सबसे अमीर आदमी बन गए हैं उन्होंने यह उपलब्धि चीनी कंपनी अलीबाबा के संस्थापक जैक मा को पछाड़ते हुए हासिल की है खबरों के मुताबिकशुक्रवार को मुकेश अंबानी की संपत्ति 44.3 बिलियन डॉलर यानी 3.012 लाख करोड़ रुपये हो गई. उधर गुरुवार को बंद हुए शेयर बाजार के भाव के अनुसार जैक मा की नेटवर्थ 44 अरब डॉलर यानी 2.99 लाख करोड़ रुपये की रही इन आंकड़ों के मद्देनजर भारतीय शेयर बाजार में रिलायंस समूह के शेयरों में जबरदस्त तेजी भी देखने को मिली। 

हिंदुस्तान में टेलीकॉम से लेकर पेट्रो कैमिकल्स जैसे अनेक क्षेत्रों में काम करने वाली रिलायंस समूह के अध्यक्ष की दौलत में इस साल 27.2 हजार करोड़ रुपये का इजाफा हुआ है उधर, साल 2018 के दौरान जैक मा की कुल दौलत में 9500 करोड़ रुपये की कमी आई है इस बीच हाल में हुई एजीएम बैठक के दौरान मुकेश अंबानी ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के ई-कॉमर्स बाजार में भी उतरने की घोषणा की थी इसके अलावा इसी साल स्वतंत्रता दिवस के मौके पर रिलांयस अपनी टेलीकॉम कंपनी जियो की ब्रॉडबैंड और डीटीएच सेवाएं शुरू करने की बात भी कर चुकी है

मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाले रिलायंस समूह के नाम पर इसी साल एक खास उपलब्धि तब जुड़ी थी जब यह दुनिया की 100 अरब डॉलर कंपनियों के क्लब में शामिल हुई थी हालांकि शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव की वजह से इसे इस क्लब से बाहर भी होना पड़ा था लेकिन इसी गुरुवार को रिलायंस यह मुकाम दोबारा हासिल कर लिया था
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भारत के मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंजों की सूची

स्टॉक एक्सचेंज क्या है, स्टॉक एक्सचेंज की स्थापना कब हुई, स्टॉक एक्सचेंज की संख्या, भारत में कुल कितने स्टॉक एक्सचेंज हैं आदि पूछे जाने प्रश्नों का ध्यान में रखकर हम यहाँ स्टॉक एक्सचेंज के बारे में चर्चा कर रहे है।

स्टॉक एक्सचेंज एक ऐसी बाज़ार है जहां निवेशक कंपनियों द्वारा विभिन्न कंपनियों के शेयर, बांड और अन्य प्रतिभूतियों को ख़रीदा और बेचा जाता हैं। सन् 1875 में स्थापित मुंबई का शेयर बाजार (बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज) एशिया का पहला शेयर बाजार है। स्टॉक मार्केट को भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा प्रबंधित और विनियमित किया जाता है। अब तक देश में 23 सेबी के स्वीकृत स्टॉक एक्सचेंज हैं। सेबी ने सुस्त कामकाज के कारण 09 जुलाई 2007 को सौराष्ट्र स्टॉक एक्सचेंज, राजकोट की मान्यता रद्द कर दी थी।     भारत में सभी स्वीकृत 23 स्टॉक एक्सचेंज के नाम इस प्रकार हैं–  1. उत्तर प्रदेश स्टॉक एक्सचेंज, कानपुर  2. वड़ोदरा स्टॉक एक्सचेंज, वडोदरा  3. कोयंबटूर स्टॉक एक्सचेंज, कोयम्बटूर  4. मेरठ स्टॉक एक्सचेंज, मेरठ  5. मुंबई स्टॉक एक्सचेंज, मुंबई  6. ओवर द काउंटर एक्सचेंज, मुंबई  7. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज, मुंबई  8. अहमदाबाद स्टॉक एक्सचेंज, अहमदाबाद  9. बैंगलुरू स्टॉक एक्सचेंज, बैंगलुरू  10. भुवनेश्वर स्टॉक एक्सचेंज, भुवनेश्वर  11. कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज, कोलकाता  12. कोचीन स्टॉक एक्सचेंज, कोचीन  13. दिल्ली स्टॉक एक्सचेंज, दिल्ली  14. गुवाहाटी स्टॉक एक्सचेंज, गुवाहाटी  15. हैदराबाद स्टॉक एक्सचेंज, हैदराबाद  16. जयपुर स्टॉक एक्सचेंज, जयपुर  17. केनरा स्टॉक एक्सचेंज, मैंगलोर  18. लुधियाना स्टॉक एक्सचेंज, लुधियाना  19. चेन्नई स्टॉक एक्सचेंज, चेन्नई  20. मध्य प्रदेश स्टॉक एक्सचेंज, इंदौर  21. मगध स्टॉक एक्सचेंज, पटना  22. पुणे स्टॉक एक्सचेंज, पुणे  23. कैपिटल स्टॉक एक्सचेंज केरल लिमिटेड, तिरुवनंतपुरम, केरल

स्टॉक एक्सचेंज एक ऐसी बाजार है जहाँ निवेशक कंपनियों द्वारा विभिन्न कंपनियों के शेयर, बांड और अन्य प्रतिभूतियों को ख़रीदा और बेचा जाता हैं। सन् 1875 में स्थापित मुंबई का शेयर बाजार (बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज) एशिया का पहला शेयर बाजार है। स्टॉक मार्केट को भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा प्रबंधित और विनियमित किया जाता है। अब तक देश में 23 सेबी के स्वीकृत स्टॉक एक्सचेंज हैं। सेबी ने सुस्त कामकाज के कारण 09 जुलाई 2007 को सौराष्ट्र स्टॉक एक्सचेंज, राजकोट की मान्यता रद्द कर दी थी। 

भारत में सभी स्वीकृत 23 स्टॉक एक्सचेंज के नाम इस प्रकार हैं–
1. उत्तर प्रदेश स्टॉक एक्सचेंज, कानपुर
2. वड़ोदरा स्टॉक एक्सचेंज, वडोदरा
3. कोयंबटूर स्टॉक एक्सचेंज, कोयम्बटूर
4. मेरठ स्टॉक एक्सचेंज, मेरठ
5. मुंबई स्टॉक एक्सचेंज, मुंबई
6. ओवर द काउंटर एक्सचेंज, मुंबई
7. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज, मुंबई
8. अहमदाबाद स्टॉक एक्सचेंज, अहमदाबाद
9. बैंगलुरू स्टॉक एक्सचेंज, बैंगलुरू
10. भुवनेश्वर स्टॉक एक्सचेंज, भुवनेश्वर
11. कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज, कोलकाता
12. कोचीन स्टॉक एक्सचेंज, कोचीन
13. दिल्ली स्टॉक एक्सचेंज, दिल्ली
14. गुवाहाटी स्टॉक एक्सचेंज, गुवाहाटी
15. हैदराबाद स्टॉक एक्सचेंज, हैदराबाद
16. जयपुर स्टॉक एक्सचेंज, जयपुर
17. केनरा स्टॉक एक्सचेंज, मैंगलोर
18. लुधियाना स्टॉक एक्सचेंज, लुधियाना
19. चेन्नई स्टॉक एक्सचेंज, चेन्नई
20. मध्य प्रदेश स्टॉक एक्सचेंज, इंदौर
21. मगध स्टॉक एक्सचेंज, पटना
22. पुणे स्टॉक एक्सचेंज, पुणे
23. कैपिटल स्टॉक एक्सचेंज केरल लिमिटेड, तिरुवनंतपुरम, केरल
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पैसों की कद्र करना कोई 'वारेन बफेट' से सीखे


यहाँ अमीर बनना कौन नहीं चाहता साहेब? सभी लोग अपने आपको रईस देखना चाहते हैं! जिनके पास आज पैसा नहीं है, वो लोग पैसा कमाना चाहते हैं और जिनके पास पैसा है, वो और पैसा कमाना चाहते हैं। इसी प्रकार से बढ़ती मानवीय इच्छाओं की पूर्ति के लिए हम दूसरों को फॉलो करने लगते हैं। ऐसे में अगर आपकी इच्छा भी करोड़पति बनने की है, तो शायद आप अंबानी या टाटा को फॉलो करते होंगे। 

ऐसे तमाम करोड़पति भारत में तो हैं ही, विदेशों में भी ऐसे लोगों की भरमार है, जो आपको बताते हैं कि आप कैसे करोड़पति बनें। इन्हीं में से एक नाम हैं वारेन बफेट. जो आज दुनिया के सबसे रईस लोगों में तीसरे नंबर पर आते हैं। बावजूद इसके ये बेहद ही साधारण जीवन जीते हैं और बहुत कम खर्चा करते हैं।    

अपनी उम्र के 88वें पड़ाव पर भी वारेन लोगों को अमीर बनना सिखा रहे हैं। लेकिन कैसे? आइए जानते हैं –    

11 साल की उम्र से शुरू की बचत   

"बॉल स्ट्रीट एक मात्र ऐसी जगह है,  रईस लोग सड़क चलने वाले लोगों से एडवाइस लेने रॉल्स रॉयस में बैठकर आते हैं।"    

ये कहना है वारेन बफेट का    

30 अगस्त 1930 को नेब्रास्का के ओमाहा में पैदा हुए वॉरेन बफेट आज एक सफल निवेशक, व्यवसायी और समाज सेवा से जुड़े रईस अमेरिकी माने जाते हैं। निवेश के मामले में उनके मंत्र, सुझाव देश दुनिया के लोग फॉलो करते हैं। वॉरेन बफेट शेयर बाजार की दुनिया के महान निवेशकों में से एक माने जाते हैं। जब बच्चे दुनिया को देखना और चीजों के बारे में समझना शुरू करते हैं, उस समय मात्र 11 साल की छोटी सी उम्र में वारेन बफेट ने अपना पहला शेयर खरीद लिया था। इन्होंने इसी उम्र से अपने परिवार के एक ग्रौसरी स्टोर में काम करना शुरू कर दिया था, ताकि उनके पास ज्यादा से ज्यादा पैसे इकट्ठे हो सकें। छोटी उम्र में ही इन्होंने बड़ी कमाई की शुरूआत कर दी थी। इनकी कमाई का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि इन्होंने अपनी 13 साल की उम्र में पहला टेक्स भर दिया था।    

इनके पिताजी एक छोटे ब्रोकर थे। लिहाजा ये उनके ऑफिस जाते, जहाँ इनका ज्यादातर वक्त ये देखने में बीतता, कि वहाँ निवेशक (इन्वेस्टर्स) कैसे स्टॉक में पैसा लगाते हैं और उससे उनकी कमाई कैसे होती है।    

ये कहा जा सकता है कि बफेट के खून में बिजनेस बसा हुआ था। अखबार बांटकर और गाड़ी साफ कर कमाए पैसे। वारेन जब हाईस्कूल में थे, तब इन्होंने 'दी वाशिंगटन पोस्ट' अखबार बांटने का काम शुरू किया। ये इनके लिए एक बेहतर जॉब थी, हर दिन कमाई। जब ज्यादातर ऑफिस खुले भी नहीं होते थे, तब तक सुबह-सुबह ये अपनी कमाई शुरू कर देते। आगे चलकर इन्होंने 'दी वाशिंगटन पोस्ट' के शेयर खरीदे और आज ये इस अखबार के सबसे बड़े शेयरहोल्डर भी हैं।   

इसी के साथ इन्होंने बड़े होने तक विभिन्न्‍ा प्रकार की नौकरियां कीं। इन्होंने अखबार बांटने के अलावा कार धोने का काम किया। बफेट इससे होने वाली कमाई को पिन बॉल मशीन खरीदने में निवेश (इन्वेस्ट) कर दिया करते थे। और इस मशीन को इन्होंने स्थानीय व्यापार में लगा दिया. इससे इनकी आमद बढ़ने लगी।    पैसे कमाने की इस इच्छा के कारण बफेट अपनी पढ़ाई से लगातार दूर हो रहे थे। लिहाजा इनके पिता ने इन्हें जबरन कॉलेज भेजा। और फिर इन्होंने नेब्रास्का विश्वविद्यालय से अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की।    

वारेन बफेट को हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में दाखिला देने से मना कर दिया गया था। इसके बदले में इन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में मास्टर्स किया। कोलंबिया बिजनेस स्कूल में मास्टर्स की पढ़ाई के दौरान ही इन्होंने मूल्य निवेश (वैल्यू इन्वेस्टमेंट) के बुनियादी सिद्धांतों को सीखा।    

स्टॉक ब्रोकर के रूप में की करियर की शुरूआत    
  • मास्टर्स के बाद बफेट वॉल स्ट्रीट पर काम करना चाहते थे। लेकिन इन्होंने ओमाहा में स्टॉक ब्रोकर के तौर पर काम शुरू कर दिया। इसी के साथ इन्होंने कई पार्टनरशिप में स्टॉक ब्रोकिंग का अपना व्यापार आगे बढ़ाया। इसी के साथ बफेट 31 साल की उम्र में करोड़पति बन चुके थे। 
  • इसी के साथ सन 1959 से इन्होंने सीधे कंपनियों में निवेश का काम शुरू कर दिया। 
  • इन्होंने पवन चक्की (विंडमिल) बनाने वाली एक कंपनी में 10 लाख यूएस डॉलर का निवेश किया। इसके एक साल बाद बोतल बनाने वाली कंपनी में भी इन्होंने पैसे लगाए। 
  • वॉरेन ने कुल सात भागीदारी फर्मों की संपत्तियों में 9.5 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी। इसके 3 साल बाद इन्होंने सभी साझेदारी फर्मों को मिलाकर एक इकाई बना दी। और खरीद ली बर्कशायर हैथवे कंपनी। 
  • अब बफेट ऐसे ही अन्य कंपनियों की तलाश में लग गए, जहाँ से उन्हें अच्छा रिटर्न मिलने की संभावना दिखाई दे रही थी। 
  • सन 1962 में इन्हें न्यू इंग्लैंड टैक्सटाइल कंपनी बर्कशायर हैथवे में निवेश करने का मौका मिला। इन्होंने इस कंपनी के कुछ शेयर खरीद लिए। 
  • इसके बाद कंपनी के प्रबंधन से इनके कुछ विवाद हो गए। और इन्होंने अब इस कंपनी को ही खरीदने का विचार बना लिया। इन्होंने अपनी बचत को बढ़ाया और फिर 1965 में इन्होंने पूरी बर्कशायर हैथवे कंपनी खरीद ही ली।   

आज, वारेन बफेट बर्कशायर हैथवे कंपनी के मुख्य प्रबंधन अधिकारी (सीईओ) हैं. इस एक ग्रुप के अंतर्गत 60 से ज्यादा कंपनियां आती हैं, जिसमें से बीमा करने वाली गीको, बैटरी बनाने वाली ड्यूरासेल और रेस्तरां चेन डेयरी क्वीन जैसी बड़ी कंपनियां शामिल हैं।    

इसके बाद इन्होंने और बड़ी कंपनियों में निवेश करना शुरू किया। उन्हीं में से एक अमेरिकन एक्सप्रेस भी थी, जिसके शेयर अगले ही साल दो गुने हो गए। इससे इन्हें बहुत फायदा हुआ।    

क्या हैं इनके निवेश मंत्र    
  • वारेन बफेट कहते हैं कि निवेश करने से पहले आपके पास उसकी पूरी योजना और लक्ष्य होना चाहिए। निवेश करने के बाद जरूरी है कि आप नतीजों का धैर्य के साथ इंतजार करें। 
  • वारेन के अनुसार, कभी भी निवेश करो, तो रकम को बांट कर अलग-अलग जगह अपनी जरूरतों के हिसाब से निवेश करो। 
  • साथ ही कुछ पैसा ऐसी जगह लगाया जाए, जहाँ ठीक-ठाक बढ़त हो, लेकिन नुक्सान कम रहे। और बाकी पैसा उच्च जोखिम लेकर उच्च रिटर्न वाले स्टॉक में लगाना चाहिए। 
  • स्टॉक में पैसा लगाने का मतलब है कि आपके पास ज्यादा पैसा होना चाहिए। उसके लिए बफेट सुझाते हैं कि कभी भी एक नौकरी पर निर्भर न रहें. इसके अलावा भी आय के कई साधन बनाएं। 
  • वारेन के मुताबिक, स्टॉक के मूल्य को देखें, कीमत को नहीं। अगर कोई महंगी कीमत वाला स्टॉक भी आपको ज्यादा ऊंचा रिटर्न देता है, तो वो आपके लिए मूल्य है। लेकिन निवेश करने से पहले दो बार अवश्य सोच लें।     

दान करेंगे संपत्ति का 99 प्रतिशत हिस्सा 
बफेट अपनी संपत्ति का 99 प्रतिशत हिस्सा दान करने का वादा कर चुके हैं। अपनी संपत्ति में से लगभग 32 अरब यूएस डॉलर ये पहले ही गेट्स फाउंडेशन को दान में दे चुके हैं।    


➤ बिल गेट्स इनके बहुत अच्छे दोस्त हैं। बफेट ने गेट्स के साथ 2010 में द गिविंग प्लेज कार्यक्रम की शुरूआत की थी। जिसका मकसद अरबपति से आधी संपत्ति धर्मार्थ कार्यों के लिए दान देने के लिए प्रेरित करना है।  

➤ वारेन बफेट आज भी ओमाहा के उसी घर में रहते हैं, जो उन्होंने आज से लगभग 60 साल पहले 1958 में 31,500 यूएस डॉलर में खरीदा था।  

➤ इनके पास खुद का कोई प्लेन नहीं है, आम लोगों की तरह सफर करते हैं. कोई शौक इन्हें नहीं है, आज भी पाई-पाई जोड़कर इन्हें उन पैसों को निवेश करना ज्यादा पसंद है।  

➤ बफेट अपनी 11 साल की उम्र से निवेश कर रहे हैं।  और शायद इसी कारण आज वो विश्व के सबसे अमीर लोगों में से एक हैं।  


12 जून, 2018 तक लगभग 83.6 अरब अमेरिकी डॉलर की नैटवर्थ के साथ वारेन बफेट दुनिया के तीसरे सबसे अमीर आदमी थे।

                                                       लेखक
                                                   राजीव रंजन (More than 4 Years experience in Stock Market.)
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कब थमेगा रुपए की फिसलन


हमारे मुद्रा बाजार में डॉलर की आपूर्ति कम हो गई है, साथ ही तेल की मांग बढ़ने से भी हमारा रुपया फिसल रहा है।

पिछले दो साल से रुपए का मूल्य लगभग 64 रुपए प्रति डॉलर पर स्थिर रहा है, लेकिन पिछले दो महीनों में यह फिसलकर 68 के स्तर पर पहुंच गया है। यानी डॉलर के सामने रुपया कमजोर हो गया है। जैसे एक डॉलर के बदले पहले यदि 64 पेंसिल मिलती थीं, तो अब 68 मिलने लगी हैं। इसका अर्थ हुआ कि पेंसिल का मूल्य कम हो गया है। विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में रुपए का मूल्य गिरकर 70 या इससे भी नीचे जा सकता है। रुपए का मूल्य बाजार में तय होता है। जिस प्रकार मंडी में आलू के दाम मांग और आपूर्ति से तय होते हैं, उसी प्रकार विदेशी मुद्रा बाजार में कुछ लोग डॉलर बेचते हैं और कुछ खरीदते हैं। जब डॉलर की आपूर्ति ज्यादा होती है तो डॉलर के दाम कम और रुपए के दाम ज्यादा हो जाते हैं। इसके विपरीत जब डॉलर की मांग ज्यादा होती है और आपूर्ति कम होती है तो डॉलर के दाम बढ़ते हैं और उसी के अनुरूप रुपए के दाम गिरते हैं। फिलहाल ऐसा ही हो रहा है। ऐसे में यक्ष प्रश्न यही है कि इस समय डॉलर की मांग ज्यादा और आपूर्ति कम क्यों हो रही है?

डॉलर की मांग बढ़ने का इस समय प्रमुख कारण तेल के बढ़ते मूल्य दिखता है। अप्रैल 2018 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का दाम 70 डॉलर प्रति बैरल था जो वर्तमान में उठकर 80 डॉलर प्रति बैरल हो गया है। साथ ही साथ रुपया 64 रुपए प्रति डॉलर से गिरकर 68 रुपए प्रति डॉलर हो गया है। दोनों घटनाक्रम समांतर चल रहे हैं। तेल के दाम बढ़ने से भारत की तेल कंपनियों को तेल की खरीद के लिए डॉलर की खरीद ज्यादा करनी पड़ती है, इसलिए डॉलर की मांग ज्यादा है, डॉलर का दाम बढ़ रहा है और रुपए का दाम घट रहा है। तेल के बढ़ते दामों का तो हम कुछ नहीं कर सकते, लेकिन यदि हम ज्यादा मात्रा में डॉलर कमा लें, यानी साथ में डॉलर की आपूर्ति भी बढ़ जाए तो रुपए का दाम स्थिर हो जाएगा। चूंकि तेल कंपनियों को तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर चाहिए, इसलिए यदि भारतीय निर्यातक ज्यादा मात्रा में माल का निर्यात करके अधिक डॉलर अर्जित कर लें तो डॉलर की आपूर्ति बढ़ जाएगी और मांग एवं आपूर्ति का संतुलन पूर्ववत बना रहेगा। यूं समझिए कि मंडी में यदि आपूर्तिकर्ता और खरीददार दोनों ही साथ-साथ बढ़ जाएं तो माल के दाम नहीं बढ़ते हैं। इस समय तेल की खरीद के लिए डॉलर की मांग की काट यही हो सकती है कि हम डॉलर की आपूर्ति को बढ़ाएं।

डॉलर की आपूर्ति हमें मुख्यत: दो मदों से मिलती है। एक रास्ता हमारे निर्यात हैं। हमारे उद्यमी ऑटो पार्ट्स अथवा गलीचे जैसी वस्तुओं का निर्यात करके डॉलर अर्जित करते हैं। वे इस डॉलर को भारतीय मुद्रा बाजार में बेचते हैं। यदि हम अपने निर्यात बढ़ा सकते तो बढ़े हुए तेल के दाम को अदा कर सकते थे, लेकिन इस समय हमारे निर्यात भी दबाव में हैं। यानी एक तरफ तेल के लिए डॉलर की मांग ज्यादा है और दूसरी तरफ निर्यात दबाव में आने से डॉलर की आपूर्ति कम हो रही है। यह आश्चर्यजनक है कि इस समय निर्यात दबाव में है, जबकि एनडीए सरकार के पिछले चार वर्षों में हाईवे और बिजली की आपूर्ति जैसे बुनियादी ढांचे में काफी सुधार हुआ है। इन सुधारों के चलते हमारे उद्योगों की उत्पादन लागत कम हुई है और उनके लिए व्यापार करना सरल हुआ है। इसलिए विश्व बाजार में हमारी प्रतिस्पर्धा शक्ति बढ़ी है। इस स्थिति में तो हमें अधिक मात्रा में डॉलर अर्जित करने थे, किंतु यहां दबाव में दिखता निर्यात हैरान करता है।

अंतरराष्ट्रीय बैंक बीएनपी पारिबास के माइकल सैंड ने भारत के निर्यात दबाव में होने के तीन कारण बताए हैं। पहला कारण शिक्षित एवं कुशल कर्मियों की अनुपलब्धता है। हमारी शिक्षा व्यवस्था मुख्यत: सरकारी विश्वविद्यालयों द्वारा संचालित हो रही है, जहां पर काम सरकारी नौकरियों के लिए सर्टिफिकेट छापकर देने मात्र का रह गया है। अर्थव्यवस्था में सक्षम कर्मियों का नितांत अभाव है। लगभग एक वर्ष पहले विश्व बैंक ने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की रैंक में भारत को 30 देशों से आगे कर दिया था, लेकिन गहराई से पड़ताल करने पर पता लगा कि ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की रैंक में यह सुधार मुख्यत: भारत में दीवालिया कानून के लागू होने के आधार पर हुआ था, जिसमें दीवालिया कंपनियों को दी गई रकम को बैंकों द्वारा वसूल करना आसान हो गया था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि बिजली कनेक्शन लेना अथवा न्यायालय से किसी वाद का निपटारा होने में परिस्थिति यथावत एवं बदतर है। ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के इन अहम पहलुओं मे कोई सुधार नहीं हुआ था। बीएनपी पारिबास के अधिकारी कह रहे हैं कि भारत में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस अभी भी कमजोर है और उत्पादन लागत के ऊंचा होने का यह दूसरा कारण है। तीसरा कारण यह है कि भारत में श्रम की उत्पादकता चीन की तुलना में कम है। गाजियाबाद में बाइक और कार के लिए केबल बनाने वाली एक कंपनी के प्रमुख अधिकारी ने बताया कि भारत और चीन के कर्मियों का वेतन बराबर है। लगभग उसी प्रकार की मशीनों पर वे उत्पादन करते हैं, लेकिन चीन के कर्मी दोगुना उत्पादन करते हैं। इसलिए उत्पादन लागत में श्रम का हिस्सा भारत में चीन की तुलना में दोगुना है और इस कारण भारत में उत्पादन लागत ज्यादा आती है। इस परिप्रेक्ष्य में यदि निर्यात को बढ़ाना है तो हमें शिक्षा, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और श्रम की उत्पादकता बढ़ाने के लिए मौलिक कदम उठाने होंगे।

डॉलर की आपूर्ति का दूसरा स्रोत विदेशी निवेश है। यहां भी परिस्थिति विपरीत हो गई है। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था में तेजी के संकेत मिल रहे हैं। दुनियाभर के निवेशक अमेरिका में निवेश को सुरक्षित मानते हैं, इसलिए पूंजी का बहाव एक बार फिर विकाशसील देशों से वापस अमेरिका की तरफ हो गया है। प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि 2017 में जनवरी से अप्रैल के बीच चार माह में भारत को 14 अरब डॉलर का विदेशी निवेश शेयरों और बांड बाजार में मिला था। वर्ष 2018 की इसी अवधि में यह घटकर मात्र 0.3 अरब डॉलर रह गया है। साफ है कि विदेशी निवेश से पहले हमें जो रकम मिल रही थी, वह अब मिलनी बंद हो गई है। इस प्रकार डॉलर की आपूर्ति के दोनों स्रोत, निर्यात और विदेशी निवेश, संकट में पड़ गए हैं। हमारे मुद्रा बाजार में डॉलर की आपूर्ति कम हो गई है और साथ ही तेल की मांग बढ़ने से भी हमारा रुपया फिसल रहा है।

हम तेल के दामों में हो रही वृद्धि अथवा विश्व पूंजी के अमेरिका की तरफ हो रहे बहाव को नहीं रोक सकते। यह हमारी सरकार के अधिकार के बाहर की बातें हैं, लेकिन अपनी अर्थव्यवस्था में उत्पादन की लागत को कम करना हमारी सरकार के नियंत्रण में है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि शिक्षा, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और श्रम की उत्पादकता बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाए, अन्यथा रुपए की फिसलन और ज्यादा बढ़ती जाएगी।
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