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पैसों की कद्र करना कोई 'वारेन बफेट' से सीखे


यहाँ अमीर बनना कौन नहीं चाहता साहेब? सभी लोग अपने आपको रईस देखना चाहते हैं! जिनके पास आज पैसा नहीं है, वो लोग पैसा कमाना चाहते हैं और जिनके पास पैसा है, वो और पैसा कमाना चाहते हैं। इसी प्रकार से बढ़ती मानवीय इच्छाओं की पूर्ति के लिए हम दूसरों को फॉलो करने लगते हैं। ऐसे में अगर आपकी इच्छा भी करोड़पति बनने की है, तो शायद आप अंबानी या टाटा को फॉलो करते होंगे। 

ऐसे तमाम करोड़पति भारत में तो हैं ही, विदेशों में भी ऐसे लोगों की भरमार है, जो आपको बताते हैं कि आप कैसे करोड़पति बनें। इन्हीं में से एक नाम हैं वारेन बफेट. जो आज दुनिया के सबसे रईस लोगों में तीसरे नंबर पर आते हैं। बावजूद इसके ये बेहद ही साधारण जीवन जीते हैं और बहुत कम खर्चा करते हैं।    

अपनी उम्र के 88वें पड़ाव पर भी वारेन लोगों को अमीर बनना सिखा रहे हैं। लेकिन कैसे? आइए जानते हैं –    

11 साल की उम्र से शुरू की बचत   

"बॉल स्ट्रीट एक मात्र ऐसी जगह है,  रईस लोग सड़क चलने वाले लोगों से एडवाइस लेने रॉल्स रॉयस में बैठकर आते हैं।"    

ये कहना है वारेन बफेट का    

30 अगस्त 1930 को नेब्रास्का के ओमाहा में पैदा हुए वॉरेन बफेट आज एक सफल निवेशक, व्यवसायी और समाज सेवा से जुड़े रईस अमेरिकी माने जाते हैं। निवेश के मामले में उनके मंत्र, सुझाव देश दुनिया के लोग फॉलो करते हैं। वॉरेन बफेट शेयर बाजार की दुनिया के महान निवेशकों में से एक माने जाते हैं। जब बच्चे दुनिया को देखना और चीजों के बारे में समझना शुरू करते हैं, उस समय मात्र 11 साल की छोटी सी उम्र में वारेन बफेट ने अपना पहला शेयर खरीद लिया था। इन्होंने इसी उम्र से अपने परिवार के एक ग्रौसरी स्टोर में काम करना शुरू कर दिया था, ताकि उनके पास ज्यादा से ज्यादा पैसे इकट्ठे हो सकें। छोटी उम्र में ही इन्होंने बड़ी कमाई की शुरूआत कर दी थी। इनकी कमाई का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि इन्होंने अपनी 13 साल की उम्र में पहला टेक्स भर दिया था।    

इनके पिताजी एक छोटे ब्रोकर थे। लिहाजा ये उनके ऑफिस जाते, जहाँ इनका ज्यादातर वक्त ये देखने में बीतता, कि वहाँ निवेशक (इन्वेस्टर्स) कैसे स्टॉक में पैसा लगाते हैं और उससे उनकी कमाई कैसे होती है।    

ये कहा जा सकता है कि बफेट के खून में बिजनेस बसा हुआ था। अखबार बांटकर और गाड़ी साफ कर कमाए पैसे। वारेन जब हाईस्कूल में थे, तब इन्होंने 'दी वाशिंगटन पोस्ट' अखबार बांटने का काम शुरू किया। ये इनके लिए एक बेहतर जॉब थी, हर दिन कमाई। जब ज्यादातर ऑफिस खुले भी नहीं होते थे, तब तक सुबह-सुबह ये अपनी कमाई शुरू कर देते। आगे चलकर इन्होंने 'दी वाशिंगटन पोस्ट' के शेयर खरीदे और आज ये इस अखबार के सबसे बड़े शेयरहोल्डर भी हैं।   

इसी के साथ इन्होंने बड़े होने तक विभिन्न्‍ा प्रकार की नौकरियां कीं। इन्होंने अखबार बांटने के अलावा कार धोने का काम किया। बफेट इससे होने वाली कमाई को पिन बॉल मशीन खरीदने में निवेश (इन्वेस्ट) कर दिया करते थे। और इस मशीन को इन्होंने स्थानीय व्यापार में लगा दिया. इससे इनकी आमद बढ़ने लगी।    पैसे कमाने की इस इच्छा के कारण बफेट अपनी पढ़ाई से लगातार दूर हो रहे थे। लिहाजा इनके पिता ने इन्हें जबरन कॉलेज भेजा। और फिर इन्होंने नेब्रास्का विश्वविद्यालय से अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की।    

वारेन बफेट को हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में दाखिला देने से मना कर दिया गया था। इसके बदले में इन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में मास्टर्स किया। कोलंबिया बिजनेस स्कूल में मास्टर्स की पढ़ाई के दौरान ही इन्होंने मूल्य निवेश (वैल्यू इन्वेस्टमेंट) के बुनियादी सिद्धांतों को सीखा।    

स्टॉक ब्रोकर के रूप में की करियर की शुरूआत    
  • मास्टर्स के बाद बफेट वॉल स्ट्रीट पर काम करना चाहते थे। लेकिन इन्होंने ओमाहा में स्टॉक ब्रोकर के तौर पर काम शुरू कर दिया। इसी के साथ इन्होंने कई पार्टनरशिप में स्टॉक ब्रोकिंग का अपना व्यापार आगे बढ़ाया। इसी के साथ बफेट 31 साल की उम्र में करोड़पति बन चुके थे। 
  • इसी के साथ सन 1959 से इन्होंने सीधे कंपनियों में निवेश का काम शुरू कर दिया। 
  • इन्होंने पवन चक्की (विंडमिल) बनाने वाली एक कंपनी में 10 लाख यूएस डॉलर का निवेश किया। इसके एक साल बाद बोतल बनाने वाली कंपनी में भी इन्होंने पैसे लगाए। 
  • वॉरेन ने कुल सात भागीदारी फर्मों की संपत्तियों में 9.5 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी। इसके 3 साल बाद इन्होंने सभी साझेदारी फर्मों को मिलाकर एक इकाई बना दी। और खरीद ली बर्कशायर हैथवे कंपनी। 
  • अब बफेट ऐसे ही अन्य कंपनियों की तलाश में लग गए, जहाँ से उन्हें अच्छा रिटर्न मिलने की संभावना दिखाई दे रही थी। 
  • सन 1962 में इन्हें न्यू इंग्लैंड टैक्सटाइल कंपनी बर्कशायर हैथवे में निवेश करने का मौका मिला। इन्होंने इस कंपनी के कुछ शेयर खरीद लिए। 
  • इसके बाद कंपनी के प्रबंधन से इनके कुछ विवाद हो गए। और इन्होंने अब इस कंपनी को ही खरीदने का विचार बना लिया। इन्होंने अपनी बचत को बढ़ाया और फिर 1965 में इन्होंने पूरी बर्कशायर हैथवे कंपनी खरीद ही ली।   

आज, वारेन बफेट बर्कशायर हैथवे कंपनी के मुख्य प्रबंधन अधिकारी (सीईओ) हैं. इस एक ग्रुप के अंतर्गत 60 से ज्यादा कंपनियां आती हैं, जिसमें से बीमा करने वाली गीको, बैटरी बनाने वाली ड्यूरासेल और रेस्तरां चेन डेयरी क्वीन जैसी बड़ी कंपनियां शामिल हैं।    

इसके बाद इन्होंने और बड़ी कंपनियों में निवेश करना शुरू किया। उन्हीं में से एक अमेरिकन एक्सप्रेस भी थी, जिसके शेयर अगले ही साल दो गुने हो गए। इससे इन्हें बहुत फायदा हुआ।    

क्या हैं इनके निवेश मंत्र    
  • वारेन बफेट कहते हैं कि निवेश करने से पहले आपके पास उसकी पूरी योजना और लक्ष्य होना चाहिए। निवेश करने के बाद जरूरी है कि आप नतीजों का धैर्य के साथ इंतजार करें। 
  • वारेन के अनुसार, कभी भी निवेश करो, तो रकम को बांट कर अलग-अलग जगह अपनी जरूरतों के हिसाब से निवेश करो। 
  • साथ ही कुछ पैसा ऐसी जगह लगाया जाए, जहाँ ठीक-ठाक बढ़त हो, लेकिन नुक्सान कम रहे। और बाकी पैसा उच्च जोखिम लेकर उच्च रिटर्न वाले स्टॉक में लगाना चाहिए। 
  • स्टॉक में पैसा लगाने का मतलब है कि आपके पास ज्यादा पैसा होना चाहिए। उसके लिए बफेट सुझाते हैं कि कभी भी एक नौकरी पर निर्भर न रहें. इसके अलावा भी आय के कई साधन बनाएं। 
  • वारेन के मुताबिक, स्टॉक के मूल्य को देखें, कीमत को नहीं। अगर कोई महंगी कीमत वाला स्टॉक भी आपको ज्यादा ऊंचा रिटर्न देता है, तो वो आपके लिए मूल्य है। लेकिन निवेश करने से पहले दो बार अवश्य सोच लें।     

दान करेंगे संपत्ति का 99 प्रतिशत हिस्सा 
बफेट अपनी संपत्ति का 99 प्रतिशत हिस्सा दान करने का वादा कर चुके हैं। अपनी संपत्ति में से लगभग 32 अरब यूएस डॉलर ये पहले ही गेट्स फाउंडेशन को दान में दे चुके हैं।    


➤ बिल गेट्स इनके बहुत अच्छे दोस्त हैं। बफेट ने गेट्स के साथ 2010 में द गिविंग प्लेज कार्यक्रम की शुरूआत की थी। जिसका मकसद अरबपति से आधी संपत्ति धर्मार्थ कार्यों के लिए दान देने के लिए प्रेरित करना है।  

➤ वारेन बफेट आज भी ओमाहा के उसी घर में रहते हैं, जो उन्होंने आज से लगभग 60 साल पहले 1958 में 31,500 यूएस डॉलर में खरीदा था।  

➤ इनके पास खुद का कोई प्लेन नहीं है, आम लोगों की तरह सफर करते हैं. कोई शौक इन्हें नहीं है, आज भी पाई-पाई जोड़कर इन्हें उन पैसों को निवेश करना ज्यादा पसंद है।  

➤ बफेट अपनी 11 साल की उम्र से निवेश कर रहे हैं।  और शायद इसी कारण आज वो विश्व के सबसे अमीर लोगों में से एक हैं।  


12 जून, 2018 तक लगभग 83.6 अरब अमेरिकी डॉलर की नैटवर्थ के साथ वारेन बफेट दुनिया के तीसरे सबसे अमीर आदमी थे।

                                                       लेखक
                                                   राजीव रंजन (More than 4 Years experience in Stock Market.)
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कब थमेगा रुपए की फिसलन


हमारे मुद्रा बाजार में डॉलर की आपूर्ति कम हो गई है, साथ ही तेल की मांग बढ़ने से भी हमारा रुपया फिसल रहा है।

पिछले दो साल से रुपए का मूल्य लगभग 64 रुपए प्रति डॉलर पर स्थिर रहा है, लेकिन पिछले दो महीनों में यह फिसलकर 68 के स्तर पर पहुंच गया है। यानी डॉलर के सामने रुपया कमजोर हो गया है। जैसे एक डॉलर के बदले पहले यदि 64 पेंसिल मिलती थीं, तो अब 68 मिलने लगी हैं। इसका अर्थ हुआ कि पेंसिल का मूल्य कम हो गया है। विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में रुपए का मूल्य गिरकर 70 या इससे भी नीचे जा सकता है। रुपए का मूल्य बाजार में तय होता है। जिस प्रकार मंडी में आलू के दाम मांग और आपूर्ति से तय होते हैं, उसी प्रकार विदेशी मुद्रा बाजार में कुछ लोग डॉलर बेचते हैं और कुछ खरीदते हैं। जब डॉलर की आपूर्ति ज्यादा होती है तो डॉलर के दाम कम और रुपए के दाम ज्यादा हो जाते हैं। इसके विपरीत जब डॉलर की मांग ज्यादा होती है और आपूर्ति कम होती है तो डॉलर के दाम बढ़ते हैं और उसी के अनुरूप रुपए के दाम गिरते हैं। फिलहाल ऐसा ही हो रहा है। ऐसे में यक्ष प्रश्न यही है कि इस समय डॉलर की मांग ज्यादा और आपूर्ति कम क्यों हो रही है?

डॉलर की मांग बढ़ने का इस समय प्रमुख कारण तेल के बढ़ते मूल्य दिखता है। अप्रैल 2018 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का दाम 70 डॉलर प्रति बैरल था जो वर्तमान में उठकर 80 डॉलर प्रति बैरल हो गया है। साथ ही साथ रुपया 64 रुपए प्रति डॉलर से गिरकर 68 रुपए प्रति डॉलर हो गया है। दोनों घटनाक्रम समांतर चल रहे हैं। तेल के दाम बढ़ने से भारत की तेल कंपनियों को तेल की खरीद के लिए डॉलर की खरीद ज्यादा करनी पड़ती है, इसलिए डॉलर की मांग ज्यादा है, डॉलर का दाम बढ़ रहा है और रुपए का दाम घट रहा है। तेल के बढ़ते दामों का तो हम कुछ नहीं कर सकते, लेकिन यदि हम ज्यादा मात्रा में डॉलर कमा लें, यानी साथ में डॉलर की आपूर्ति भी बढ़ जाए तो रुपए का दाम स्थिर हो जाएगा। चूंकि तेल कंपनियों को तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर चाहिए, इसलिए यदि भारतीय निर्यातक ज्यादा मात्रा में माल का निर्यात करके अधिक डॉलर अर्जित कर लें तो डॉलर की आपूर्ति बढ़ जाएगी और मांग एवं आपूर्ति का संतुलन पूर्ववत बना रहेगा। यूं समझिए कि मंडी में यदि आपूर्तिकर्ता और खरीददार दोनों ही साथ-साथ बढ़ जाएं तो माल के दाम नहीं बढ़ते हैं। इस समय तेल की खरीद के लिए डॉलर की मांग की काट यही हो सकती है कि हम डॉलर की आपूर्ति को बढ़ाएं।

डॉलर की आपूर्ति हमें मुख्यत: दो मदों से मिलती है। एक रास्ता हमारे निर्यात हैं। हमारे उद्यमी ऑटो पार्ट्स अथवा गलीचे जैसी वस्तुओं का निर्यात करके डॉलर अर्जित करते हैं। वे इस डॉलर को भारतीय मुद्रा बाजार में बेचते हैं। यदि हम अपने निर्यात बढ़ा सकते तो बढ़े हुए तेल के दाम को अदा कर सकते थे, लेकिन इस समय हमारे निर्यात भी दबाव में हैं। यानी एक तरफ तेल के लिए डॉलर की मांग ज्यादा है और दूसरी तरफ निर्यात दबाव में आने से डॉलर की आपूर्ति कम हो रही है। यह आश्चर्यजनक है कि इस समय निर्यात दबाव में है, जबकि एनडीए सरकार के पिछले चार वर्षों में हाईवे और बिजली की आपूर्ति जैसे बुनियादी ढांचे में काफी सुधार हुआ है। इन सुधारों के चलते हमारे उद्योगों की उत्पादन लागत कम हुई है और उनके लिए व्यापार करना सरल हुआ है। इसलिए विश्व बाजार में हमारी प्रतिस्पर्धा शक्ति बढ़ी है। इस स्थिति में तो हमें अधिक मात्रा में डॉलर अर्जित करने थे, किंतु यहां दबाव में दिखता निर्यात हैरान करता है।

अंतरराष्ट्रीय बैंक बीएनपी पारिबास के माइकल सैंड ने भारत के निर्यात दबाव में होने के तीन कारण बताए हैं। पहला कारण शिक्षित एवं कुशल कर्मियों की अनुपलब्धता है। हमारी शिक्षा व्यवस्था मुख्यत: सरकारी विश्वविद्यालयों द्वारा संचालित हो रही है, जहां पर काम सरकारी नौकरियों के लिए सर्टिफिकेट छापकर देने मात्र का रह गया है। अर्थव्यवस्था में सक्षम कर्मियों का नितांत अभाव है। लगभग एक वर्ष पहले विश्व बैंक ने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की रैंक में भारत को 30 देशों से आगे कर दिया था, लेकिन गहराई से पड़ताल करने पर पता लगा कि ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की रैंक में यह सुधार मुख्यत: भारत में दीवालिया कानून के लागू होने के आधार पर हुआ था, जिसमें दीवालिया कंपनियों को दी गई रकम को बैंकों द्वारा वसूल करना आसान हो गया था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि बिजली कनेक्शन लेना अथवा न्यायालय से किसी वाद का निपटारा होने में परिस्थिति यथावत एवं बदतर है। ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के इन अहम पहलुओं मे कोई सुधार नहीं हुआ था। बीएनपी पारिबास के अधिकारी कह रहे हैं कि भारत में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस अभी भी कमजोर है और उत्पादन लागत के ऊंचा होने का यह दूसरा कारण है। तीसरा कारण यह है कि भारत में श्रम की उत्पादकता चीन की तुलना में कम है। गाजियाबाद में बाइक और कार के लिए केबल बनाने वाली एक कंपनी के प्रमुख अधिकारी ने बताया कि भारत और चीन के कर्मियों का वेतन बराबर है। लगभग उसी प्रकार की मशीनों पर वे उत्पादन करते हैं, लेकिन चीन के कर्मी दोगुना उत्पादन करते हैं। इसलिए उत्पादन लागत में श्रम का हिस्सा भारत में चीन की तुलना में दोगुना है और इस कारण भारत में उत्पादन लागत ज्यादा आती है। इस परिप्रेक्ष्य में यदि निर्यात को बढ़ाना है तो हमें शिक्षा, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और श्रम की उत्पादकता बढ़ाने के लिए मौलिक कदम उठाने होंगे।

डॉलर की आपूर्ति का दूसरा स्रोत विदेशी निवेश है। यहां भी परिस्थिति विपरीत हो गई है। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था में तेजी के संकेत मिल रहे हैं। दुनियाभर के निवेशक अमेरिका में निवेश को सुरक्षित मानते हैं, इसलिए पूंजी का बहाव एक बार फिर विकाशसील देशों से वापस अमेरिका की तरफ हो गया है। प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि 2017 में जनवरी से अप्रैल के बीच चार माह में भारत को 14 अरब डॉलर का विदेशी निवेश शेयरों और बांड बाजार में मिला था। वर्ष 2018 की इसी अवधि में यह घटकर मात्र 0.3 अरब डॉलर रह गया है। साफ है कि विदेशी निवेश से पहले हमें जो रकम मिल रही थी, वह अब मिलनी बंद हो गई है। इस प्रकार डॉलर की आपूर्ति के दोनों स्रोत, निर्यात और विदेशी निवेश, संकट में पड़ गए हैं। हमारे मुद्रा बाजार में डॉलर की आपूर्ति कम हो गई है और साथ ही तेल की मांग बढ़ने से भी हमारा रुपया फिसल रहा है।

हम तेल के दामों में हो रही वृद्धि अथवा विश्व पूंजी के अमेरिका की तरफ हो रहे बहाव को नहीं रोक सकते। यह हमारी सरकार के अधिकार के बाहर की बातें हैं, लेकिन अपनी अर्थव्यवस्था में उत्पादन की लागत को कम करना हमारी सरकार के नियंत्रण में है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि शिक्षा, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और श्रम की उत्पादकता बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाए, अन्यथा रुपए की फिसलन और ज्यादा बढ़ती जाएगी।
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कैबिनेट ने चमड़ा एवं फुटवियर क्षेत्र में रोजगार सृजन के लिए विशेष पैकेज को मंजूरी दी

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्‍यक्षता में केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल ने चमड़ा एवं फुटवियर क्षेत्र में रोजगार सृजन के लिए विशेष पैकेज को मंजूरी दे दी है। इस पैकेज में 2017-18 से लेकर 2019-20 तक के तीन वित्‍त वर्षों के दौरान 2600 करोड़ रुपये के स्‍वीकृत व्‍यय के साथ ‘भारतीय फुटवियर, चमड़ा एवं सहायक सामान विकास कार्यक्रम’ का कार्यान्‍वयन शामिल है।   
प्रमुख प्रभाव
    केन्‍द्रीय क्षेत्र की इस योजना से चमड़ा क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के विकास का मार्ग प्रशस्‍त होगा, चमड़ा क्षेत्र से जुड़ी विशिष्‍ट पर्यावरणीय चिंताएं दूर होंगी, अतिरिक्‍त निवेश में सहूलियत होगी, रोजगार सृजन होगा और उत्‍पादन में वृद्धि होगी। ज्‍यादा कर प्रोत्‍साहन मिलने से इस क्षेत्र में व्‍यापक निवेश को आकर्षित किया जा सकेगा और इस क्षेत्र के सीजनल स्‍वरूप को ध्‍यान में रखते हुए श्रम कानून में सुधार से उत्‍पादन स्‍तर में वृद्धि संभव हो पाएगी।
     विशेष पैकेज में तीन वर्षों के दौरान 3.24 लाख नये रोजगारों को सृजित करने की क्षमता है और इससे फुटवियर, चमड़ा एवं सहायक सामान क्षेत्र पर संचयी असर के रूप में दो लाख रोजगारों को औपचारिक स्‍वरूप प्रदान करने में मदद मिलेगी।

भारतीय फुटवियर, चमड़ा एवं सहायक सामान विकास कार्यक्रम का विवरण
  1. मानव संसाधन विकास (एचआरडी) उप-योजना : एचआरडी उप-योजना में 15,000 रुपये प्रति व्‍यक्ति की दर से बेरोजगार व्‍यक्तियों को प्‍लेसमेंट से संबद्ध कौशल विकास प्रशिक्षण, 5000 रुपये प्रति कर्मचारी की दर से कार्यरत कामगारों को कौशल उन्‍नयन प्रशिक्षण और प्रति व्‍यक्ति 2 लाख रुपये की दर से प्र‍शिक्षकों को प्रशिक्षण के लिए सहायता देने का प्रस्‍ताव है। कौशल विकास प्रशिक्षण घटक से संबंधित सहायता प्राप्‍त करने के लिए 75 प्रतिशत प्रशिक्षित व्‍यक्तियों का प्‍लेसमेंट अनिवार्य करने का प्रस्‍ताव है। इस उप-योजना के तहत 696 करोड़ रुपये के प्रस्‍तावित परिव्‍यय के साथ तीन वर्षों के दौरान 4.32 लाख बेरोजगार व्‍यक्तियों को प्रशिक्षित करने/कौशल प्रदान करने, 75000 मौजूदा कर्मचारियों का कौशल उन्‍नयन करने और 150 मुख्‍य प्रशिक्षकों को प्रशिक्षित करने का प्रस्‍ताव है।
  2. चमड़ा क्षेत्र के एकीकृत विकास (आईडीएलएस) की उप-योजना : आईडीएलएस उप-योजना के तहत मौजूदा इकाइयों के आधुनिकीकरण/तकनीकी उन्‍नयन के साथ-साथ नई इकाइयों की स्‍थापना के लिए सूक्ष्‍म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) को नये संयंत्र एवं मशीनरी की लागत के 30 प्रतिशत की दर से और अन्‍य इकाइयों को संयत्र एवं मशीनरी की लागत के 20 प्रतिशत की दर से बैकएंड निवेश अनुदान/सब्सिडी प्रदान करके रोजगार सृजन सहित विनिर्माण एवं निवेश को प्रोत्‍साहन देने का प्रस्‍ताव है। इस उप-योजना के तहत 425 करोड़ रुपये के प्रस्‍तावित परिव्‍यय के साथ 3 वर्षों के दौरान चमड़ा, फुटवियर एवं सहायक सामान और कलपुर्जा क्षेत्र की 1000 इकाइयों को प्रोत्‍साहन देने का प्रस्‍ताव है।
  3. संस्‍थागत सुविधाओं की स्‍थापना की उप-योजना : इस उप-योजना के तहत तीन वर्षों के दौरान 147 करोड़ रुपये के प्रस्‍तावित परिव्‍यय के साथ फुटवियर डिजाइन एवं विकास संस्‍थान (एफडीडीआई) के कुछ मौजूदा परिसरों का उन्‍नयन करके उन्‍हें ‘उत्‍कृष्‍टता केंद्रों’ में तब्‍दील करने और प्रस्‍तावित मेगा चमड़ा क्‍लस्‍टरों, जो परियोजना संबंधी प्रस्‍तावों पर आधारित होंगे, के आसपास पूर्ण सुविधाओं से युक्‍त तीन नये कौशल केंद्रों की स्‍थापना के लिए एफडीडीआई को सहायता प्रदान करने का प्रस्‍ताव है।
  4. मेगा चमड़ा, फुटवियर एवं सहायक सामान क्‍लस्‍टर (एमएलएफएसी) उप-योजना : एमएलएफएसी उप-योजना का उद्देश्‍य मेगा चमड़ा, फुटवियर एवं सहायक सामान क्‍लस्‍टर की स्‍थापना करके चमड़ा, फुटवियर एवं सहायक सामान क्षेत्र को बुनियादी ढांचागत सहायता प्रदान करना है। उपयुक्‍त परियोजना लागत के 50 प्रतिशत तक श्रेणीबद्ध सहायता देने का प्रस्‍ताव है, जिसमें भूमि की लागत शामिल नहीं होगी और इसके तहत अधिकतम सरकारी सहायता 125 करोड़ रुपये तक सीमित होगी। तीन वर्षों के दौरान 3-4 नये एमएलएफएसी को आवश्‍यक सहायता प्रदान करने के लिए 360 करोड़ रुपये का परिव्‍यय प्रस्‍तावित किया गया है।
  5. चमड़ा प्रौद्योगिकी, नवाचार एवं पर्यावरणीय मुद्दों से जुड़ी उप-योजना : इस उप-योजना के तहत परियोजना लागत के 70 प्रतिशत की दर से साझा अपशिष्‍ट शोधन संयंत्रों (सीईटीपी) के उन्‍नयन/स्‍थापना के लिए सहायता देने का प्रस्‍ताव है। इस उप-योजना के तहत राष्‍ट्रीय स्‍तर की क्षेत्रवार उद्योग परिषद/संघ को सहायता देने के साथ-साथ चमड़ा, फुटवियर एवं सहायक सामान क्षेत्र के लिए विजन दस्‍तावेज तैयार करने हेतु भी मदद दी जाएगी। इस उप-योजना हेतु तीन वर्षों के लिए प्रस्‍तावित परिव्‍यय 782 करोड़ रुपये है।
  6. चमड़ा, फुटवियर एवं सहायक सामान क्षेत्र में भारतीय ब्रांडों को प्रोत्‍साहन देने की उप-योजना : इस उप-योजना के तहत ब्रांड के संवर्धन के लिए स्‍वीकृत पात्र इकाइयों को सहायता देने का प्रस्‍ताव है। इसके तहत तीन वर्षों के दौरान प्रत्‍येक साल सरकारी सहायता कुल परियोजना लागत का 50 प्रतिशत तय करना प्रस्‍तावित है, जो प्रत्‍येक ब्रांड के लिए अधिकतम 3 करोड़ रुपये होगी। इस उप-योजना के तहत 90 करोड़ रुपये के प्रस्‍तावित परिव्‍यय के साथ 3 वर्षों के दौरान अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार में 10 भारतीय ब्रांडों का संवर्धन करने का प्रस्‍ताव है।
  7. चमड़ा, फुटवियर एवं सहायक सामान क्षेत्र के लिए अतिरिक्‍त रोजगार प्रोत्‍साहन की उप-योजना: इस उप-योजना के तहत ईपीएफओ में नामांकन कराने वाले चमड़ा, फुटवियर एवं सहायक सामान क्षेत्र के सभी नये कर्मचारियों के लिए उनके नियोजन के प्रथम तीन वर्षों के दौरान कर्मचारी भविष्‍य निधि में 3.67 प्रतिशत का नियोक्‍ता योगदान करने का प्रस्‍ताव है। यह उप-योजना 15000 रुपये तक का वेतन पाने वाले कर्मचारियों के लिए मान्‍य होगी। 100 करोड़ रुपये के प्रस्‍तावित परिव्‍यय से संबंधित क्षेत्रों में लगभग 2,00,000 रोजगारों को औपचारिक करने में मदद मिलेगी।
विशेष पैकेज में श्रम कानूनों के सरलीकरण के लिए उपाय और रोजगार सृजन के लिए प्रोत्‍साहन भी शामिल हैं, जिनका उल्‍लेख नीचे किया गया है –
  1. आयकर अधिनियम की धारा 80जेजेएए का दायरा बढ़ाना : किसी कारखाने में वस्‍तुओं के उत्‍पादन में संलग्‍न भारतीय कंपनी द्वारा नये कर्मचारी को तीन वर्षों तक अदा किये गये अतिरिक्‍त पारिश्रमिक पर उसे टैक्‍स कटौती का लाभ देने हेतु आयकर अधिनियम की धारा 80जेजेएए के तहत किसी कर्मचारी के लिए एक वर्ष में न्‍यूनतम 240 दिनों के रोजगार के प्रावधानों में और ज्‍यादा ढील देकर फुटवियर, चमड़ा एवं सहायक सामान क्षेत्र के लिए इसे न्‍यूनतम 150 दिन कर दिया जाएगा। यह कदम इस क्षेत्र के सीजनल स्‍वरूप को ध्‍यान में रखते हुए उठाया जा रहा है।
  2. निश्चित अवधि के रोजगार की शुरुआत : विश्‍व भर से व्‍यापक निवेश आकर्षित करने के लिए औद्योगिक रोजगार (स्‍थायी आदेश) अधिनियम, 1946 की धारा 15 की उप धारा (1) के तहत निश्चित अवधि वाले रोजगार की शुरुआत करके श्रम संबंधी मुद्दों के नियामकीय ढांचे को दुरुस्‍त करने का प्रस्‍ताव है। चमड़ा, फुटवियर एवं सहायक सामान उद्योग के मौसमी (सीजनल) स्वरूप को ध्‍यान में रखते हुए यह कदम उठाया जा रहा है।      
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What is Bharat-22?

Bharat 22 is an ETF (Exchange Traded Fund), launched by the government, containing shares of 22 companies including Central Public-Sector Enterprises (CPSEs), Public Sector Banks and shares of some companies owned by government investment arm SUUTI (Specified Undertaking of Unit Trust of India).
The Bharat 22 ETF concluded on 22nd November and has mobilised Rs 14500 crores. All investor segments reported oversubscription, indicating tremendous investor interest.
What is an exchange traded fund?
An Exchange Traded Fund (ETF) is a type of fund that owns the underlying assets and is divided into different shares. It is a marketable security (in the form of shares) that contains a slice of cumulated shares/bonds/commodities/foreign currencies that is sliced into different shares.
What is the objective of issuing Bharat 22?
The main objective of Bharat 22 is to mobilise funds through the selling of the ETF and thus to meet the disinvestment target set under the Budget 2017-18. The budget has set a disinvestment target of Rs 72500 crores for the current year. Mobilisation or Rs 14500 crores from Bharat 22 is expected to push government’s disinvestment revenue this year so far to Rs 52500 crores.
Bharat 22 is the second ETF issued by the government for supporting the disinvestment programme. The first endeavour was the CPSE – ETF (Central Public-Sector Enterprises ETF) that was issued in March 2014 and raised Rs 3,000 crore. The CPSE ETF was a bundle of 10 PSU shares. Later, the government has made two follow-on offers of the CPSE ETF thereby raising Rs 8,500 crores.
Compared to the CPSE ETF, the Bharat 22 holds shares of more companies. There will be a single company cap of 15% weightage in the fund, implying that maximum of a company’s share in the ETF will be 15% of the total fund in terms of value. Similarly, separate sector cap of 15% is also made. Hence, Bharat 22 is more diversified compared to the CPSE ETF.
Another feature of Bharat 22 is that it holds shares of private sector enterprises as well. On the other hand, the CPSE-ETF had only PSE shares. Here, the government’s custody of shares of some of the private sector companies owned by the government investment arm - SUUTI (Specified Undertaking of Unit Trust of India) will be attached under Bharat 22. SUUTI is holding shares of nearly 50 companies through its predecessor- the UTI. The investment arm is having sizable shares in several big private sector companies like ITC, Axis Bank, L&T etc.
Sectors and firms covered under Bharat 22
The Bharat-22 holds shares of companies from six different sectors. From the banking sector alone, the ETF contains four stocks — SBI, Bank of Baroda, Indian Bank and Axis Bank (Pvt). Major feature is the SUUTI’s holding in ITC will be included. Shares of Coal India, BPCL, Nalco, ONGC and IOC are also included.
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आईपीओ क्या हैं? आईपीओ में Invest कैसे करें?



औद्योगिक क्रांति के बाद पूरे विश्व में निजी और सार्वजनिक कंपनियों ने व्यवसाय करने के तरीके बिलकुल बदल दिये। जैसा की आप जानते हैं की किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को stability देने में उस देश की Private और Public कंपनियों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इसी के साथ एक सच और भी सब जानते हैं की Company की प्रकृति कैसी भी हो, उन्हें अपना व्यवसाय शुरू करने से लेकर आगे चलाने तक, यानि हर कदम पर पूंजी या धन की आवश्यकता होती है। Capital यानि पूंजी प्राप्त करने के लिए कंपनी के पास दो रास्ते होते हैं। एक तो अंश पूंजी जिसे Equity या Shares भी कहा जाता है और दूसरा ऋण पूंजी जिसे Loan या Debenture भी कहा जा सकता है। समय और जरूरत के अनुसार कंपनी दोनों प्रकार की पूंजी को प्राप्त करने का प्रयत्न करतीं हैं।

अगर कोई कंपनी Share Market के जरिये धन प्राप्त करना चाहती है तो इसके लिए कंपनी को Open Market में Shares  को issue करना होता है  जिन्हें जनता के बीच खरीदा और बेचा जा सके। जब कोई Company पहली बार अपने Shares को Public में Issue करती हैं तो इस प्रक्रिया को IPO यानि Initial Public Offering कहते हैं। आइये आपको इस बारे में विस्तार से जानकारी देते हैं जिससे आप भी अगर किसी कंपनी के IPO में Invest करना चाहते हैं तो उस निर्णय में आपको सुविधा हो सके।

आईपीओ क्या है: What is IPO
किसी भी कंपनी को जब वित्त या पैसों की जरूरत होती है तो उसके लिए वह जनता, बैंक या फिर वित्तीय संस्थानों के पास जाती है। जनता से वित्त प्राप्त करने के दो रूप हैं। एक तो उनसे वित्त (Finance) प्राप्त करके उन्हें कंपनी के स्वामित्व और प्रबंधन में हिस्सेदार बना लिया जाए। इस तरीके से जो Capital या Funds एकत्रित किये जाते है उसे Share Capital कहा जाता है। दूसरा रूप है जनता से जो पूंजी ली जाए उसे ऋण मानकर, एक निश्चित समय पर वो पैसा वापस कर दिया जाए। इसे Debentures या Loan Capital कहा जाता है।

जब कोई कंपनी इक्विटी में Public से Fund जुटाना चाहती हैं तो उस समय वह Share Market में लिस्टेड होकर अपने General Shares को पब्लिक के सामने पहली बार Issue करती है, इसी प्रोसैस को Initial Public Offering (IPO) कहा जाता है। जो लोग कंपनी के Shares खरीदना चाहते हैं, वे अपना आवेदन कर सकते हैं और सभी आवेदन प्राप्त होने के बाद Company पूँजी के बदले Shares को आवेदकों में बाँट देती हैं। इस प्रकार कंपनी के शेयर्स जनता के बीच पहुँच जाते हैं और कंपनी को पूँजी प्राप्त हो जाती हैं।

इसके बाद यह शेयर्स, शेयर मार्केट में ख़रीदे-बेचे जा सकते हैं। इस प्रकार कंपनी अपने एक्सपेंशन के लिए आईपीओ के द्वारा capital को जुटाने का प्रयास करती है। आम भाषा में IPO को पब्लिक इशू भी कहा जाता है। IPO हमेशा समान्य जनता के समक्ष प्रस्तुत किया जाता हैं और कोई भी आईपीओ में Invest करके उस कंपनी के Ownership में हिस्सेदार बन सकते हैं| IPO के बाद shares को शेयर बाजार से खरीदा जा सकता हैं।

प्रॉस्पेक्टस क्या हैं – Meaning of Prospectus in Hindi
Prospectus, किसी भी आईपीओ का सबसे महत्वपूर्ण Document (दस्तावेज) होता हैं| जब भी कोई Company अपना IPO जारी करती हैं तब सबसे पहले वह Public Issue का Prospectus जारी करती हैं| यह एक प्रकार का Legal Document होता हैं जिसमें Company और Public Issue या IPO से सम्बंधित Detailed Information होती हैं जैसे कितने Shares जारी किये जाएंगे, Price क्या होती, IPO से प्राप्त पैसे का क्या उपयोग किया जाएगा, Director की जानकारी, Company के पिछले Profit और Financial डाटा, निवेशको की Risk, प्रमोटर्स के शेयर्स आदि।

यह प्रॉस्पेक्टस SEBI से Approved होता हैं और इसमें आपको IPO और Company से सम्बंधित हर प्रकार की जानकारी मिल जाएगी| IPO में Invest करने से पहले Prospectus की एक एक जानकारी को अच्छे से समझ लेना चाहिए।


कंपनी आईपीओ क्यूँ जारी करतीं हैं:
जब किसी कंपनी को अपने वर्तमान स्वरूप में बदलाव करना होता है या फिर अपने वर्तमान आकार को बढ़ाना होता है तो उस समय पूंजी की आवश्यकता होती है। इस पूंजी को इकट्ठा करने के लिए वो जनता के सामने Public Issue या IPO लेकर आतीं हैं। इसके अलावा शेयर बाजार में ट्रेडिंग करने के लिए भी IPO Issue किए जाते हैं।

IPO से जुड़े महत्वपूर्ण शब्द:  
आईपीओ को और अच्छी तरह से समझने के लिए आपको इससे जुड़े हुए कुछ महत्वपूर्ण शब्दों की जानकारी होनी बहुत जरूरी है। यह इस प्रकार है :

इशू का नाम (Issue): यह उस Company का नाम होता है जो आईपीओ को जारी करती है। दूसरे शब्दों में Shares के नाम उन्हें जारी करने वाली कंपनी के नाम से जाने जाते हैं। जैसे अगर डोमिनो पिज्जा कंपनी अपने आई पी ओ लाती है तो इशू का नाम भी ‘डोमिनो पिज्जा’ होगा।

इशू का प्रकार (Types of Issue): कंपनी दो प्रकार के इशू जारी कर सकती है। एक तो Book Building और दूसरा Fixed Price। स्थायी कीमत या Fixed Price में शेयर्स की कीमत में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हो सकता। निवेशक उसी कीमत पर इन्हें खरीदते हैं जिनपर कंपनी इन्हें जारी करती है। जबकि Book Building में निवेशक बोली लगाकर अंशों या Shares को कंपनी से खरीद सकते हैं।

कीमत बैंड (Price Band): अधिकतर कंपनियाँ अपने IPO को जारी करते समय उसकी Price स्वयं तय करती है। लेकिन जो कंपनियाँ इंफ्रास्ट्र्क्चर और इससे संबन्धित क्षेत्रों में होतीं हैं उन्हें कीमत तय करने के लिए सेबी और/या रिजर्व बैंक से अनुमति लेनी होती है।

कट-ऑफ प्राइस (Cut off Price): जब कंपनी Book Building के द्वारा Shares जारी करती है तो निवेशकों को ऐसे शेयर्स Allot करते समय जो कीमत तय करती है उसे Cut-off Price कहते हैं। जैसे अगर किसी कंपनी ने 10 रु में अपनी शेयर्स जारी किए लेकिन शेयर्स को आबंटित करते समय उनकी कीमत 11 रुपए कर दी तो यह 11 रुपए इन शेयर्स के Cut-off Price माने जाएंगे।

कट ऑफ डेट और टाइम (Cut Off Date): कंपनी अपने Shares के आवेदन करने की एक तिथि और समय निर्धारित कर देती है। निवेशकों को इस तिथि और समय तक ही IPO के लिए Apply करने की सुविधा होती है। समानयरूप में यह तिथि IPO मार्केट में लाने के 3 से 5 दिन तक होती है। जैसे अगर डोमिनो 25 अगस्त को अपने शेयर्स मार्केट में ला रहे हैं तो 29 अगस्त के शाम 5 बजे तक निवेशक इन अंशों का आवेदन या Subscription के लिए Application दे सकते हैं। इसके बाद यह कंपनी अपने अगले चरण की प्रक्रिया शुरू कर सकती है।

लॉट साइज: Lot Size शेयर्स की वो संख्या होती है जिसके आधार पर कोई निवेशक आई पी ओ का आवेदन कर सकता है। जैसे माना किसी कंपनी के शेयर्स को आप 10, 20 या 50 की संख्या में ही खरीद सकते हैं, अपनी इच्छा के आधार पर नहीं। यही संख्या Lot Size कहलाती है।

निवेशक की श्रेणी (Types of Investors): जो लोग कंपनियों के अंशों को खरीदते हैं या फिर निवेश करते हैं, उन्हें आमतौर पर रिटेल निवेशक कहा जाता है। इसके अलावा निवेशक Non-Institutional, High Net Worth Individuals और Qualified Institutional Bidders की श्रेणी में भी रखा जा सकता है। कोई भी सामान्य व्यक्ति एक Retail Investor के रूप में किसी भी कंपनी के 2 लाख रुपए तक (maximum limit) के IPO Shares को खरीद सकता है।

IPO में Invest कौन कर सकता हैं 
कोई भी वयस्क या अवयस्क और स्वस्थ मस्तिष्क वाला व्यक्ति जो  का निवेश करना चाहता है वह रिटेल निवेशक के रूप में आई पी ओ में निवेश कर सकता है। आपके पास अगर Pan Number, Bank Account और Demat Account है तो आप किसी भी कंपनी के आई पी ओ में निवेश करने के योग्य माने जाते हैं। आप चाहें तो कंपनी के शेयर्स को एक सर्टिफिकेट रूप में Physical Form में अपने पास रख सकते हैं या अगर आप चाहें तो Demat Account में भी इनको ट्रान्सफर कर सकते हैं।


आईपीओ में निवेश कैसे करे: How to Invest in IPO
भारत में अगर आप Investor के रूप में किसी कंपनी के IPO में निवेश करना चाहते हैं तो आपकी सुविधा के लिए भारतीय सरकार के कॉर्पोरेट मंत्रालय और SEBI ने कुछ नियमों (Rules) और गाइडलाइन्स का निर्धारण किया है जो उनकी वेबसाइट पर उपलब्ध हैं।

अगर आपके पास Demat Account या Trading Account  नहीं  हैं तो सबसे पहले आपको एक अच्छे Brocker के पास अपना Demat Account खुलवाना चाहिए और उसके बाद निवेश से पहले कंपनी के Prospectus का अच्छी तरह से Detailed Analysis कर लेना चाहिए। कंपनी द्वारा जारी किए गए Share की Price, उस कंपनी की बाज़ार में साख या Goodwill, कंपनी के प्रवर्तक या Promotors की साख का भी ध्यान पूर्वक अध्ययन करें।

जिस कंपनी को आप निवेश के लिए चुन लेते हैं, उसको अंतिम रूप देने से पहले, उसका उस जैसी ही दूसरी कंपनियों से तुलना जरूर करें। इस प्रकार आप एक सही कंपनी का चयन कर पाएंगे। इसके अतिरिक्त आप निवेश बाजार में कंपनियों की रेटिंग का भी ध्यानपूर्वक अध्ययन करें। इसके बाद  इस प्रकार आप एक सही कंपनी का चयन कर सकेंगे।

आई पी ओ के अंतर्गत निवेश करने के लिए आपके पास बैंक खाता, डीमैट एकाउंट और पैन नंबर होना बहुत जरूरी है। इसके बाद अपने जिस कंपनी का चयन किया है उसके Prospectus और Application Form ले लें। उसके बाद ठीक रूप से भरा गया फॉर्म निर्धारित राशि के डिमांड ड्राफ्ट के साथ निर्धारित बैंक में जमा कर दें।
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भारत सरकार ने आज आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल म्युचुअल फंड द्वारा प्रबंधित भारत-22 एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) लांच किया

भारत सरकार ने आज आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल म्युचुअल फंड द्वारा प्रबंधित भारत-22 एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) लांच किया। ईटीएफ का लक्ष्य 8000 करोड़ रुपये की प्रारंभिक राशि प्राप्त करना है। इस नए फंड का ऑफर 17 नवंबर, 2017 तक खुला है। योजना की 25 प्रतिशत यूनिट प्रत्येक श्रेणी के निवेशक को आवंटित की जाएगी। इस ईटीएफ में रिटायरमेंट फंड निवेशकों को अलग श्रेणी में है। विस्तार के मामले में खुदरा और रिटायरमेंट फंडों को प्राथमिकता देते हुए अतिरिक्त भाग का आवंटन किया जाएगा। सभी निवेशकों के लिए 3 प्रतिशत का डिस्काउंट होगा।इस ईटीएफ की शक्ति विशेष रूप से बनाया गया सूचकांक एसएंडपी बीएसई भारत-22 सूचकांक में निहित है। यह सूचकांक सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के शेयरों का अनोखा मिश्रण है और सरकार ने विश्वसनीय निजी कंपनियों जैसे – लारसन एंड ट्यूबरो, एक्सिस बैंक तथा आईटीसी के शेयर खरीदे हैं। सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था के 6 क्षेत्रों – वित्त, उद्योग, ऊर्जा, उपयोगिता, उपभोक्ता सामान तथा बुनियादी सामग्रियों - में शेयर लिए गए हैं। यह सामंजस्य सूचकांक को व्यापक और विविध बनाता है।क्षेत्र और स्टॉक सीमा जोखिम प्रबंधन में सहायक है और सघनता में कमी लाती है। इससे सूचकांक को स्थिरता मिलती है। इस सूचकांक की शक्ति अगस्त, 2017 में इसके लांच किए जाने के बाद से ही इसके कार्य प्रदर्शन में दिखने लगी और यह सूचकांक निफ्टी-50 तथा सूचकांक से आगे निकल गया। सूचकांक घटकों में महारत्न और नौरत्न कंपनियां हैं जैसे – कोल इंडिया, गेल, पावर ग्रिड कारपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (पीजीसीआईएल), राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (एनटीपीसी), इंडियन ऑयल कारपोरेशन, तेल और प्राकृतिक गैस (ओएनजीसी), भारत पेट्रोलियम तथा राष्ट्रीय एलुमिनियम कंपनी (नालको), सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक – भारतीय स्टेट बैंक, बैंक ऑफ बड़ोदा और उपरोक्त तीन निजी क्षेत्र की कंपनियां।भारत सरकार अनेक आर्थिक कार्यक्रम चला रही है इससे इन क्षेत्रों में वृद्धि हो रही है।निम्नलिखित प्रमुख सुधारों से बाजार विशेषज्ञों को आशा है कि अर्थव्यवस्था में विकास होगा और ईटीएफ स्टॉक से लाभ होगा।वित्त : दिवाला और दिवालियापन संहिता, 2016, डिजिटल और नकदी रहित अर्थव्यवस्था, बीमा कंपनियों की सूचीबद्धता, बैंकों का फिर से पूंजीकरण तथा वस्तु और सेवा कर (जीएसटी)।वाणिज्य : भारत में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) का उदारीकरणतेल : एलपीजी सब्सिडी का प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, ईंधन का दैनिक मूल्य निर्धारण, सरकारी तेल कंपनियों की मजबूती।ऊर्जा : भारत की बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) को पुनर्जीवित करने के लिए पैकेजx
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